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रविवार, 22 मार्च 2009

मज़ेदार, ज्ञानवर्धक, बढ़िया, रोचक व अनुपम

चिट्ठाजगत में प्रतिदिन अनेकों प्रविष्टियाँ ऐसे विशेषणों से सराही जाती हैं (और चाहिए भी) । ये हिन्दी चिट्ठाजगत की उप्लब्धी है और चिट्ठाकारों की प्रखरता का प्रमाण । पर उसके बाद क्या? हाँ, ब्लॉगवानी सबसे अधिक पसन्द की गई प्रविष्टियों की सूची दिखाता है ताकी दूसरे पाठक भी उन्हें पढ़ सकें । लेकिन अन्ततः सब लिखा-पढ़ा अलग-अलग आर्काइवों की गलियों में कहीं खो जाता है ।


हाल ही में चिट्ठाजगत के आर्काइवों का भ्रमण करते हुए सारथी पर एक तर्क पढ़ा कि जब हम अख़बार की भान्ति कुछ पढ़ते हैं तो हमारी स्मरण शक्ती कम होती चली जाती है । कहीं हम ब्लॉग भी भूल जाने के लिए तो नहीं पढ़ रहे हैं ?


मानती हूँ कि हर पसन्दीदा पोस्ट को हृदयंगम कर लेना न तो नैसर्गिक है और न ही लाज़मी । ये भी सच है कि कभी-कभी कोई लेख, कहानी या कविता हमें प्रभावित अथवा प्रेरित कर जाती है; फिर भले ही पढ़ा हुआ याद रहे न रहे, परन्तु उससे प्राप्त हुई प्रेरणा और प्रॊत्साहन मस्तिष्क में कहीं न कहीं घर कर ही जाते हैं । मेरी मान्यता तो यह भी है कि ज़िन्दगी का घड़ा पलों से ही भरता है यानी अगर कोई लिखित रचना पल भर का बौद्धिक आनन्द भी दे जाए तो वह एहसास ही पाठक व लेखक दोनों का पारितोषक है, अभीप्सित है । और किसी चर्चा के चलते किसी लेख में कही गई बात याद आ जाए, तो  उचित आर्काइव में जाकर उद्धृत किया जा सकता है, या फिर याद्दाश्त से उल्लेख ।


ये सब जानने-समझने के बाद भी एक परिस्थिती छूट जाती है । दसियों रचनाएँ पढ़ते-पढ़ते कोई एक ऐसी मिल जाती है जिसे खो देने का डर सा लगता है । पढ़ने और टिपियाने के बाद भी मन नहीं भरता । मेरे लिए बिलकुल वैसा है जैसे कोई किताब पुस्तकालय से लेकर पढ़ ली जाए, जितनी बार इजाज़त हो उतनी बार दुबारा उधार ले ली जाए, और उसके बाद भी उसे खरीदने को मन ललचाये ।  इसलिए क्योंकि ऐसा लगता है कि वो किताब फिर से पढ़नी चाहिए – उसे जितनी बार पढ़ा जाएगा कुछ नया सीखने को मिलेगा, नई प्रेरणा मिलेगी । ऐसा ही आभास कुछ गिनी-चुनी ब्लॉग-प्रविष्टियों को पढ़कर मुझे हुआ । क्या किसी और को भी होता है?


ख़ैर, मैंने इसका उपाय ढूढने का प्रयत्न किया है । ब्लॉगर के “My Links” विजेट के माध्यम से उन ख़ास रचनाओं को अपने ब्लॉग पर सुरक्षित रखा है, ताकि वे हर वक्त सामने ही दिखती रहें और उन्हें कभी-भी दुबारा पढ़ा जा सके । साथ ही साथ स्वयं को एवम् आगंतुकों को आदेश भी दिया गया है कि “इन्हें भी पढ़ें!” (वैसे बार-बार पढ़ने का मौका मिले-न-मिले, मन को तसल्ली तो है कि जो लेख फिर से पढ़ने चाहिए, वो मैंने सम्भाल कर, ठीक सामने ही रख लिए हैं!)


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बुधवार, 25 फ़रवरी 2009

आखिर कितने हैं ब्लॉग एग्रीगेटर?


मैंने हाल ही में ब्लॉग शुरू किया है और एक सप्ताह पूर्व तक तो मैं ब्लॉग एग्रीगेटर का मतलब भी नहीं जानती थी। अब यह नौबत आ गयी है कि पांच एग्रीगेटरों में पंजीकरण करवा चुकी हूँ जबकी ब्लॉग पर दिखाने को भी मुश्किल से पांच ही पोस्ट हैं! वैसे याद करुँ तो मेरा ब्लॉग लिखने का कारण था स्वान्तः सुखाय: -- केवल हिंदी भाषा से जुड़े रहने के लिए शुरू किया था चिट्ठा; न की फौलोअर, समर्थक या प्रशंसक पाने के लिए। तो फिर ये एग्रीगेटरों से जुड़ने की लत कैसे और क्यों लगी?



अब तो ब्लॉग जगत के नए-पुराने खिलाड़ियों से यही विनम्र अनुरोध है कि कृपया बता दें कि आखिर कितने ब्लॉग एग्रीगेटर हैं हिंदी चिट्ठों के लिए? इन्टरनेट की दुनिया बहुत विशाल है और सर्च इंजन प्रयोग करने पर भी बहुत सी जानकारी छूट जाती है, इसलिए मदद मांग रही हूँ। अब या तो ये गुहार सुन लीजिए या इस लत से छुटकारा पाने का कोई उपाय बता डालिए।

(मैंने अपने लिए ब्लॉग लिखने के कुछ नियम बनाए थे जिनके अनुसार कोई भी पोस्ट दस वाक्यों से कम की नहीं होनी चाहिए। पर यहाँ तो केवल एक छोटा सा प्रश्न पूछना था जो की दरअसल शीर्षक में ही पूछ लिया था। तो दस वाक्य नहीं, यहाँ तो तीन शब्दों में ही काम चल सकता था। अरविन्द जी ने सिखाया कि तुलसीजी ने सुझाया था कि "अर्थ अमित अति आखर थोड़े" पर यहाँ उसका बिलकुल विपरीत है।)



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सोमवार, 16 फ़रवरी 2009

ब्लॉग लिखने के कुछ नियम


ये ब्लॉग न तो दुनिया को कोई संदेश देने के लिए है और न ही अपनी लेखनी की उदात्तता दर्शाने के लिए बल्कि इसका एक सहज सा उद्देश्य है - मेरे द्वारा हिन्दी भाषा का प्रयोग। तो किस विषय पर लिखा जाय यह तय करना थोड़ा कठिन है। उचित यही होगा की कुछ नियम बना लिए जाएँ जिससे की लिखना बरकरार रहे। अभी जो नियम सोच पायी हूँ, वे हैं:
१) हर पोस्ट में कम से कम दस वाक्य होने चाहिए।

२) पिछली पोस्ट में लिखे गए किसी शब्द या विचार को अगली पोस्ट का विषय बनाओ। उदाहरण के लिए अपनी सबसे पहली पोस्ट में मैंने कहा की कुछ न करने से थोड़ा ही करना अच्छा है और फिर अगली पोस्ट में Slumdog Millionaire की चर्चा की जिसकी सब तो नही लेकिन कुछ बातें अच्छी लगी। इसी प्रकार अब अगली पोस्ट में Slumdog वाली पोस्ट में से कोई विचार उठाना है। यह कुछ-कुछ अन्ताक्षरी के खेल जैसा है; बस आखरी अक्षर से शुरुआत करने की आवश्यकता नही है।
३) हर नई पोस्ट में पिछली पोस्टों से जो नए शब्द सीखने को मिले, उनका प्रयोग करने की चेष्टा अवश्य करनी है।
४) जबरन कठिन शब्द नही घुसाने कि अगले दिन स्वयं को ही मतलब समझ न आए!
५) ज्यादा अच्छा करने कीकोशिश में सोचने में वक्त बरबाद नही करना।


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बुधवार, 28 जनवरी 2009

शुभारम्भ !


वैसे तो ब्लॉग इन्टरनेट पर अपना journal होता है लेकिन इस ब्लॉग का मक्सद कुछ और ही है इस ब्लॉग के जरिये मैं हिन्दी से जुड़े रहने की एक कोशिश कर रही हूँ। अपनी दिनचर्या में तो हिन्दी फिल्म देखने या हल्की- फुल्की बातचीत करने के आलावा हिन्दी से कोई और वास्ता नही पड़ता -- न तो मैं हिन्दी में कुछ पढ़ती हूँ, न लिखती हूँ शुरुआत हुई कुछ मित्रों के हिन्दी ब्लॉग पढ़ने से और फिर सोचा, क्यों न लिखना भी शुरू किया जाए सबसे बड़ी परेशानी यह है की मेरा शब्दकोष बहुत ही छोटा है -- शायद पाँच-छः साल के बच्चे जितना जब दूसरों का ब्लॉग पढ़ते समय ही कई शब्द समझ नही आते और अर्थ पता करने का वक्त भी नहीं मिल पता-- बस पूरे वाक्य के सन्दर्भ में ही अर्थ का अंदाजा लगा लिया करती हूँ -- तो ख़ुद लिखने की क्या सूझी?

जितनी जानती हूँ, कहीं वो भी न भूल जाऊं, कुछ तो इस डर से और क्या पता थोड़ा-थोड़ा लिखने से कोई सुधर हो जाए, ऐसी आशा से ही यह काम शुरू रही हूँ क्या लिखूंगी? नही पता वक्त मिलेगा? नही पता कब तक जोश रहेगा? नही पता कुछ न करने से थोड़ा ही करना अच्छा होता है -- इस विचार से शुरुआत कर रही हूँ आगे राम जाने


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इस ब्लॉग के बारे में...

इस ब्लॉग के ज़रिये मैं अपनी हिंदी में सुधार लाना चाहती हूँ. आपसे अनुरोध है की अगर आपको मेरी भाषा, वर्तनी, व्याकरण, अभिव्यक्ति इत्यादि में कोई भी त्रुटि नज़र आए, तो मुझे अवश्य बताएँ और मेरा मार्गदर्शन करें. यहाँ पधारने का धन्यवाद!

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