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गुरुवार, 2 अप्रैल 2009

बूढ़ी घोड़ी, लाल लगाम!*

ये हिन्दी भाषा के सबसे अधिक दुःखदायी मुहावरों

Happy Old Age 2 

में

से एक है। जब भारतीय संस्कृति वृद्धों के प्रति इतनी संवेदनशील व आदरभाव वाली है तो हमारी भाषा में ऐसा कथन कहाँ से घुस गया?    शायद अजित वडनेरकर जी इस विषय में कुछ रौशनी डाल सकें शब्दों के सफ़र पर। क्या हमें बुज़ुर्गों का आदर केवल तभी करना चाहिए जब वे ऊट-पटांग सामाजिक सीमाओं में बंधे रहें, वरना परिहास?


कपड़ा वही, दाम भी वही, परन्तु चुना जाएगा बेरंग या गन्दा-भूरा। पसन्द अपनी अपनी होती है लेकिन सिर्फ़ इस डर से कि कहीं कोई “बूढ़ी *** ” न कह दे? मेरी समझ से तो बाहर है।

ख़ैर, अगर बात बस कपड़ों वगैरा की होती तो इतना बड़ा मसला न होता, पर बात तो है मानसिकता की। हमेशा ऐसा सुनने को क्यों मिलता है (सम्पूर्ण भारत में, पर खासकर छोटे शहरों-कस्बों में) कि “अरे! इन बुड्ढा-बूढी की ज़रूरतें ही कितनी होंगी? इन्हें तो अब सन्तोश रखना चाहिए!” अर्थात अपना मन मार के जीना सीखना चाहिए!


क्या ऐसा लिखा है वेदों, शास्त्रों या ग्रन्थों में?


कमाल की बात यह है कि पश्चिम में जो उम्र छिपाने और सदैव जवान दिखने की पागलपन की हद तक होड़ है, वो मुझे तो इसी मानसिकता का दूसरा पहलू लगती है। क्योंकि जब तक जवान दिखेंगे, तभी तक जीवन के मज़े लूटने की इजाज़त मिलेगी। बस वहाँ वृद्धाश्रम हैं और यहाँ अपने ही घर में रूखा-सूखा जीवन। सबका आदर पाने के लिए स्वयं को एक अच्छा वृद्ध साबित कीजिए; समझ या आचरण से नहीं बल्कि अपने पहनावे आदी से!! यानी बुज़ुर्गों के लिए चैन तो कहीं भी नहीं दुनिया में – कहीं सर्जरी इत्यादी के ज़रिए ज़रूरत से अधिक जवान दिखने की कोशिश तो कहीं भद्दे कपड़े पहन और हाथ में औपचारिक मनके गिन अत्यधिक वृद्ध दिखने की चेष्टा।


अब एक पहलू और भी देखिए। किस्से ये भी ले लीजिए। एक वृद्ध पुरुष बस से उतरने के लिए ड्राइवर से अनुरोध करते हैं कि बेटा, अगले स्टॉप पर ज़रा आराम से रोक कर चलना। चालक हामी तो भर देता है पर जब स्टॉप आने पर वे वृद्धपुरुष ज़रा धीमि गती से बस की सीढ़ियाँ उतरते हैं तो चालक से रहा नहीं जाता है ऊँची आवाज़ और करारे शब्दों में अपनी राय रसीद किए बग़ैर, “बाबाजी, अब घर पर ही बैठा कीजिए! इस उम्र में ज़्यादा घूमने-फिरने की ज़रूरत नहीं है!” क्यों, दो-तीन पल अधिक रुकना पड़ गया, इसलिए? कुछ ऐसा ही सरकारी दफ़्तरों में भी होता है। नियम है कि वरिष्ठ नागरिकों को प्राथमिकता दी जाए तो एक ऐसे नागरिक कतार में सबसे आगे चले जाते हैं। अब सरकारी नौकर की टिप्पणी सुनिए, “अन्कल जी, क्या आपके कोई बच्चे नहीं हैं जो आप चले आये यहाँ पर?” तो काम करवाने से पहले ये बताएँ कि आपके कितने बच्चे हैं और कहीं उन्होंने आपको घर से निकाल बाहर तो नहीं किया है। अगर  वृद्ध सक्षम हैं और घर के अन्दर-बाहर के कार्यों में योगदान देना चाहते हैं, तो इजाज़त नहीं, जब तक ये साबित न कर दें कि उनका “कोई सहारा नहीं है”।


इस बात से सरोकार करना पड़ेगा कि ऊपरोक्त परेशानियाँ किसी को भी झेलनी पड़ सकती हैं, फिर भले ही आप संयोजित परिवार में क्यों न रहते हों। इसलिए वृद्धों की बात आते ही केवल संयोजित परिवार व्यवस्था नामक हल सुझाकर मुद्दे को रफ़ा-दफ़ा नहीं किया जा सकता।


मेरी दुआ तो हमेशा ये ही होती है कि सब अपनी वृद्धावस्था का आनन्द लेने के बाद ही जीवन से अलविदा लें। समाज में वृद्ध-विमर्ष की आवश्यकता है। क्योंकि आर्थिक या पारिवारिक सुरक्षा पर्याप्त नहीं हो सकते किसी के जीने के लिए। हाँ, आज हालात ऐसे हैं कि इतना भी नहीं है वृद्धों के लिए। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम चिन्तन का विषय ही यहीं तक सीमित कर दें। सामाजिक, बौद्धिक और अन्य कई पहलुओं पर भी ध्यान देना पड़ेगा।



* इस पोस्ट को लिखने की प्रेरणा मिली चिट्ठाजगत की इन दो प्रविष्टियों से -
बूढे लोगों का क्या काम समाज में!

वृद्धावस्था और आधुनिक श्रवण कुमार


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मंगलवार, 10 मार्च 2009

कितने वर्ष जीना चाहोगे? - 2

"मैम!?" वो लड़का चिल्ला-सा पड़ा. "मैंने तो ऐसा नहीं कहा! मैं अपने घर के बड़ों से बेहद प्यार करता हूँ. मैं चाहता हूँ कि भगवान उन्हें बहुत-बहुत लम्बी उम्र दे! आप ने ऐसा सोचा भी कैसे, मैम?" नवी कक्षा में पहुँचने से बहुत पहले ही लड़के रोना-धोना अपनी बेज्ज़ती समझते हैं - रोने को लड़कियों का काम कहते हैं पर वो रुआन्सू-सा हो गया था. इससे पहले की अध्यापिका कुछ कहती या करती, मेरी कॉमिक वाली दोस्त अपनी कुर्सी से उठ खड़ी हुई और बोली, "मैम, ये बिलकुल ठीक कह रहा है. आपने उसकी बात का बिलकुल गलत अर्थ निकाल लिया. वो तो केवल इतना कहना चाहता होगा की बड़े लोगों की ज़िन्दगी कितनी बोरिंग-सी लगती है. हमारे लिए तो अच्छा है क्योंकि वे लोग सब कुछ हमारे लिए ही करते हैं लेकिन उनके खुद के लिए कितना बोरिंग होगा. पूरे समय बस बच्चों, घर और ऑफिस के काम करने की ज़िम्मेदारी और कोई आराम नहीं!"
तभी एक और छात्र ने कहा, "मैम, मेरे हिसाब से तो साठ बहुत ज्यादा है. मेरे लिए तो चालीस की उम्र ही काफी है. और फिर इतने साल जीकर करना भी क्या है?"
इसके बाद तो सब एक साथ बोलने लगे -
"पचास, मैम!"
"नहीं, नहीं, पैंतालिस!"
"मैम, चालीस!"
"साठ!"
"मैम, पैंसठ बहुत है!"
"बासठ!"
"मैम उनचास!"
"पचपन!"
सब नियंत्रण से बाहर हो चुके थे और अध्यापिका शान्ति रखने के लिए कह ही रही थी, कि एक और जवाब आया -
"पैंतीस!"

मेरे पाँव के नीचे से तो जैसे ज़मीन ही खिसक गयी. क्योंकि ये उत्तर देने वाली कोई और नहीं, मेरी बगल में बैठी मेरी सबसे प्रिय दोस्त थी. मैं उसे एक टक घूर रही थी. आखिर वो ऐसा कैसे कह सकती थी कि वह सिर्फ पैंतीस साल तक जीना चाहती है? नहीं, यह ज़रूर मज़ाक कर रही है, मैंने सोचा.
"क्या कहा तुमने?" अध्यापिका ने पूछा. "पैंतीस? केवल पैंतीस?"
"जी मैम," मेरी दोस्त ने जवाब दिया.
अध्यापिका ने एक गहरी सांस ली और बोली, "क्या तुम्हें पता है कि मेरी अपनी उम्र छत्तीस वर्ष की है?"
"मैम, लगती नहीं!" सबसे पीछे बैठे एक लड़के की आवाज़ आई.
"तुम चुप बैठो! किसीने तुम्हारी राय पूछी?" और अध्यापिका ने पलटकर मेरी दोस्त कि ओर देखा.
उसने कहा, "मैम, वैसे तो मुझे ये बात एक ज्योतिषी ने बताई थी कि मैं केवल पैंतीस साल ही जीऊँगी लेकिन मैं स्वयं भी इतनी आयु के ख़याल से खुश हूँ. और फिर इतिहास भी तो देखिए. हमारी इतिहास की पुस्तक छोटी उम्र में ही चल बसने वालों से भरी पड़ी हैं और उन्ही को हम आज याद करते हैं. महान कवि कीट्स से लेकर भगत सिंह तक! यानी उन्ही का जीवन सफल था - ज्यादा लम्बा जीने से आपका जीवन ज्यादा सार्थक हो जाएगा, ऐसा तो कोई ज़रूरी नहीं!"
मैं मन ही मन मुस्कुराई. मुझे अब विशवास हो गया था कि मेरी दोस्त केवल मज़ा लेने के लिए अध्यापिका के सामने उल्टे-सीधे तर्क झाड़ रही थी. पर मैं थोडी हैरान भी थी. एक तो उसका चेहरा बहुत ही गंभीर था और वो नाटक करती लग नहीं रही थी और दूसरा, ऐसी टाइमपास वाली हरकतें मैं तो कभी-कबार कर भी लेती थी, पर वह तो कभी नहीं करती थी.
मैं ये सब अभी सोच ही रही थी कि अध्यापिका जी ने पूरी कक्षा को समझाना शुरू कर दिया था. वे आइंस्टाइन, गाँधी, शेक्स्पीअर व डार्विन की जीवनियों से उदाहरण भी दे रही थी. वे कह रही थी कि केवल ज़िम्मेदारी के डर से छोटी उम्र की कामना करना बिलकुल बेवकूफी है. ऐसा बहुत कुछ कहा और अंत में यह कि अपनी जान-पहचान के किसी भी बुजुर्ग-से-बुजुर्ग व्यक्ति से पूछ लेना, कोई भी मरना नहीं चाहता है.
जब वे अपनी बात ख़त्म कर अगले प्रश्न की ओर बढ़ने लगीं, तो मैंने झट-से अपना हाथ खड़ा कर दिया. "हाँ बोलो!" अध्यापिका ने मेरी ओर देख कर कहा.
"मैम, बाकी सबका तो पता नहीं, पर मैं तेईस जनवरी दो हज़ार बयासी को मरना चाहती हूँ!" मैंने फटाक से कहा.
"हैं?!" अध्यापिका के मुंह से बस इतना ही निकला.
मैंने आगे बोला, "मैम, उस दिन मेरा सौवां जन्मदिन होगा. मैं अच्छे से चॉकलेट केक खाकर और सारे तोहफे देखकर ख़ुशी-ख़ुशी उस दिन मर जाऊँगी."
पूरी कक्षा में सबकी ठहाकेदार हंसी गूँज उठी. सबसे पीछे बैठे उस लड़के ने "हैप्पी बर्डे टू यू, दादी अम्मा" गाना शुरू कर दिया और कई बच्चे उसके साथ गाने लग पड़े. अध्यापिका जी उन्हें शांत करवा ही रही थी कि अगले पीरिअड की घंटी बज गयी. उन्होंने मेज़ से अपना बैग उठाया लेकिन सीधा बाहर जाने कि बजाए मेरी ओर आने लगी. मैं घबरा गई, "आज तो खूब सुनना पड़ेगा. बस प्रिंसिपल के पास न ले जाएँ."
लेकिन उन्होंने केवल हल्का सा मुस्कुरा कर एक बार मेरा सर थप-थपाया और पलट कर बाहर चली गयीं. मैंने उस समय तो राहत कि सांस ले ली पर उसके एक-दो हफ्ते बाद तक सब ने मुझे कई रंगीन नामों से बुलाया - ग्रैनी, दादी अम्मा, बूढी घोड़ी, रयूमैटिक्स, भटकती आत्मा, वगैरा वगैरा. खैर, मैं भी ईंट का जवाब पत्थर से देती थी.

आज, मुझे उन अध्यापिका जी का न तो नाम ही याद है और न चेहरा. मैं उन्हें कभी नहीं बता पाऊँगी कि उनके उस प्रश्न ने कितनी गहरी छाप छोड़ी. वो प्रश्न और उससे जुड़े हुए कई और प्रश्न मुझे आज भी सताते हैं.


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कितने वर्ष जीना चाहोगे? - 1

अरविन्द जी ने "लॉन्ग लिव" का आशीर्वाद दिया तो अचानक स्कूल के दिनों से एक किस्सा याद आ गया. बात उस ज़माने की है (हा हा) जब मैं नवी कक्षा में थी. एक पीरिअड खाली था जिसे हम "अरेंजमेंट" पीरिअड कहते थे और एक जीवविज्ञान की अध्यापिका कक्षा में शांति बनाए रखने के लिए आयीं. वे छात्रों से हल्की-फुल्की बातचीत करने लगी पर मेरा ध्यान डेस्क के नीचे रखे चिप्स खाने में (जो की आगे बैठे लड़के ने सिर्फ दो मिनट के लिए दिए थे और उसके बाद मुझे आगे पास करने थे) और आर्चीज़ कॉमिक को जल्दी-जल्दी पढने में था (जो मेरे पीछे बैठी दोस्त की थी और सिर्फ उस पीरिअड की उधारी थी). जल्दी-जल्दी इसलिए भी क्योंकि मेरी बगल में बैठी दोस्त भी साथ-साथ पढ़ रही थी और वो मुझसे थोडी तेज़ रफ़्तार से पढ़ती थी और पेज पलटने की जल्दी में थी. तात्पर्य यह कि मैं अत्यधिक व्यस्त थी और मेरे पास किसी अध्यापिका की बेकार की गप्पें सुनने का समय तो बिलकुल भी नहीं था.

मैं इसी प्रकार अपना काम ध्यानपूर्वक और पूरी निष्ठा के साथ कर रही थी जब न चाहते हुए भी एक आवाज़ कान में पड़ ही गयी, "येस यू ! द गर्ल विद स्पेक्स !" मैंने सर ऊपर उठाकर देखा. मेरा पारा चढ़ चुका था. चश्मे वाली लड़की - आखिर ये कोनसा तरीका हुआ किसी को संबोधित करने का? मैंने अध्यापिका को आँखों में आँखें डाल कर देखा. खड़े होने की ज़हमत भी नहीं उठाई. "तुम क्या कर रही हो?" अध्यापिका ने पूछा. "पढ़ रही हूँ," मैंने सीधा जवाब दिया और जानबूझकर, अंत में "मैम" नहीं लगाया. अध्यापिका का माथा ठनका. मेरे बगल में बैठी दोस्त मुझे फिक्रमंद आँखों से घूर रही थी और पाँव मार कर खड़े होने का इशारा भी कर रही थी पर मैं टस से मस नहीं हुई. बाकी पूरी कक्षा मजेदार तमाशे के ताक में ऐसी चुप हुई के मानो सबने सांस भी लेना बंद कर दिया हो.
उनकी इच्छा पर ठंडा पानी फेंकते हुए अध्यापिका ने शांत स्वर में कहा, "वो तो मैंने भी देखा. मैं यह पूछ रही थी कि क्या पढ़ रही हो. खैर, कुछ अहम बातों के बारे में सबका मत जानने के लिए मैं कक्षा के समक्ष एक प्रश्नावली रख रही हूँ; अगर तुम चाहो, तो थोडी देर पढने की बजाय इसमें सबके साथ हिस्सा लो." और मेरे जवाब का इंतज़ार किए बगैर उन्होंने कक्षा को बताना शुरू कर दिया कि वे किस प्रकार की प्रश्नावली की बात कर रही थी और सब छात्र-छात्राओं को क्या करना था. मैंने अड़ियलपन में एक बार फिर कॉमिक की ओर ध्यान केन्द्रित किया पर मेरी दोस्त अब अध्यापिका की बात सुन रही थी. मन में उसे "डरपोक दगाबाज़" कहा और अकेले ही पढने लगी. अब तो पूरी किताब मेरे कब्जे में थी, उसे मेज़ के बीचों-बीच रखने के भी ज़रुरत नहीं थी. फिर भी मैं पहले की तरह नहीं पढ़ पा रही थी - लाख कोशिश करने पर भी मेरा ध्यान बार-बार अध्यापिका के सवाल और बच्चों के जवाब सुनने की ओर आकर्षित हो रहा था.
इसी कश-म-कश के चलते एक सवाल कानों से होकर मस्तिष्क तक पहुँच ही गया (जबकि सब कुछ अनसुना करने का मेरा प्रयत्न पूरे जोरों पर था). यह था वो सवाल जिसने मेरी आर्चीज़ कॉमिक पढने की घोर तपस्या भंग कर दी, "अगर तुम चुन सको, तो कितने वर्ष जीना चाहोगे?" (अंग्रेजी में कुछ ऐसा था- "इफ यू हैड द चॉएस, हाओ लॉन्ग वुड यू लाइक टु लिव फॉर?")
आखिर मैंने हार मान ही ली. किताब बंद कर पीछे पकड़ा दी. दायीं कोहनी को मेज़ पर और ठुड्डी को हाथ पर टिकाया, और सबके जवाब सुनने के लिए चौकन्नी होकर बैठ गयी. तब एक लड़के ने कहा, "मैम, साठ."
"यानी अब से साठ वर्ष और? कुल मिला कर तेहत्तर-पचहत्तर?" अध्यापिका जी ने पूछा.
"नहीं, नहीं, मैम! साठ वर्ष की उम्र काफी है," उस लड़के ने जवाब दिया.
अध्यापिका के चेहरे पर आश्चर्य और परेशानी दोनों साफ़ झलक रहे थे. मैं भी हैरान थी. "ये उल्लू बोल क्या रहा है?" - मैंने सोचा. एक या दो को छोड़कर, अपनी कक्षा के लड़कों की मानसिक क्षमता के बारे में मेरी कुछ ख़ास अच्छी राय तो वैसे भी नहीं थी. पर यह तो नई नीचाइयों को छु रहा था.
जब और किसी ने कोई जवाब नहीं दिया तो अध्यापिका ने उसी लड़के से थोड़े हलके स्वर में प्यार से पूछा, "बेटा, क्या तुम्हारे दादा-दादी व नाना-नानी नहीं हैं?" लड़के ने झट जवाब दिया, "बिलकुल हैं, मैम. इसीलिए तो कह रहा हूँ. उनका जीना भी क्या जीना है! मैं कभी वैसा बुड्ढा नहीं बनना चाहता."
कक्षा में एकदम से शोर-सा फ़ैल गया जैसा कि तीस-पैंतीस बच्चों के एकसाथ फुसफुसाकर बातचीत करने से पैदा होता है. अब सब आपस में उसकी बात पर चर्चा कर रहे थे. किन्तु अध्यापिका ने सबको शांत करवाते हुए, काफी ऊंचे स्वर में उस लड़के से कहा, "क्या तुम्हे बिलकुल शर्म नहीं आती? अपने घर के बुजुर्गों के बारे में ऐसा कह रह हो? वे तुम्हे कितना प्यार करते होंगे और तुम्हे उनका जीवित रहना इतना खलता है?"


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मंगलवार, 24 फ़रवरी 2009

प्रभाव



किस पर किस का कितना
कब हो जाए, यह कहना
है नामुमकिन सपना

कोई मुलाक़ात, इक बात
न जाने कब किसके साथ
बन जाएँ कैसे हालात --

पुस्तक, चित्र या फिर आइना
बदल के रख दे हर माइना
समझ तो इसको मैं पाई न

कभी-कबार धुंधला एहसास
धीरे से होता आभास
बंधा जाता जीने में आस

प्रश्न चिह्न पर बहुत बड़ा
क्यों सब पे इक-सा न पड़ा?
अपनों को क्यों दिया लड़ा?


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इस ब्लॉग के बारे में...

इस ब्लॉग के ज़रिये मैं अपनी हिंदी में सुधार लाना चाहती हूँ. आपसे अनुरोध है की अगर आपको मेरी भाषा, वर्तनी, व्याकरण, अभिव्यक्ति इत्यादि में कोई भी त्रुटि नज़र आए, तो मुझे अवश्य बताएँ और मेरा मार्गदर्शन करें. यहाँ पधारने का धन्यवाद!

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